लिहाफ़: इस्मत चुगताई की कहानियों पर एक पाठकीय समीक्षा
इस्मत चुगताई की लिहाफ़ सिर्फ एक विवादित कहानी नहीं, बल्कि स्त्री जीवन, पितृसत्ता, इच्छा और समाज की चुप्पियों को समझने वाली महत्वपूर्ण रचना है। इस समीक्षा में मैं किताब के सार, प्रमुख विषयों और पढ़ते समय बने अपने अनुभवों पर बात कर रहा हूँ।
लिहाफ़ क्यों पढ़ी
इस्मत आपा – जिस नाम से उन्हें लोग प्यार से बुलाते थे उनका सिर्फ नाम ही सुना था। मंटो फिल्म के जरिये उन्हें थोड़ा जाना और उनकी शख्सियत का अंदाजा हुआ तो उनको पढ़ने की इच्छा हुई। यह कहानी संग्रह एक अच्छा माध्यम लगा उनको पढ़ने का तो सोचा इस किताब से ही शुरू किया जाए।
लिहाफ़ संग्रह में क्या है
लिहाफ़ – इस्मत चुगताई की सत्रह लघु कहानियों का संग्रह है। इन्ही कहानियों में एक कहानी है लिहाफ़ जो बाद में चलकर बहुत मशहूर हुई, लेकिन उस समय इस कहानी को लेकर उनपर लाहौर हाईकोर्ट में मुकदमा चला था जो बाद में खारिज़ हो गया था। आरोप था अश्लीलता का क्यूंकि कहानी समलैंगिकता के विषय पर थी।
स्त्री मन, समाज और पितृसत्ता
उनकी हरेक कहानी में नारी प्रमुख किरदार होती हैं और जो कि माध्यम वर्गीय मुस्लिम पृष्ठ्भूमि से आती हैं। इनमे अधिकतर किरदार रूढ़िवादी पितृसत्ता व्यवस्था के अंदर जवान होती लड़कियों की मनोदशा को इस्मत चुगताई ने बखूबी दर्शया है। हरेक कहानी अपने समय के सामाजिक परिवेश को दर्शाती है। कोई भी कहानी और अधिक प्रभावशाली और सुन्दर हो जाती है अगर कहानीकार शब्दों के तानो -बानो को सही से बुने। कहानी पढ़ते वक़्त आपको इस बात का भी अनुभव होगा की कैसे किसी भाव को बड़ी ही सुंदरता से कहा गया है। एक और बात जो कहानियों में देखने को मिलती है वो ये कि लगता है हर किरदार को इस्मत आपा बहुत अच्छे से जानती हो, जैसे हर रोज़ उनसे बात करती हों और उनकी हर छोटी-बड़ी , अच्छी-बुरी सब बातों को जानती हों। अगर आप ध्यान से कहानी पड़ेंगे तो आपको कहानी का कर पात्र नज़र आने लगेगा, उसका घर , घर को जाती सड़क , उसका कमरा , कमरे में रखा सामान आपकी आँखों के सामने आ जाएगा मानो आप फ़िल्म देख रहे हों।
इस्मत चुगताई की कहानियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह औरतों को सिर्फ पीड़ित या आदर्श रूप में नहीं दिखातीं। उनकी स्त्रियाँ इच्छाओं, गुस्से, अकेलेपन, जिज्ञासा और विरोधाभासों से भरी हुई हैं। यही बात उनकी कहानियों को आज भी प्रासंगिक बनाती है। वह समाज की उन परतों को खोलती हैं जिन्हें अक्सर घर की इज़्ज़त, परंपरा और शालीनता के नाम पर छिपा दिया जाता है।
हिंदुस्तानी भाषा और पढ़ने का अनुभव
कहानिया हिंदुस्तानी में कही गयी है, इसलिए उर्दू शब्द काफी मिलेंगे जिनका हिंदी अनुवाद फुटनोट्स में दिया हुआ है। अगर आप हिंदी किताबें नहीं पढ़ते हैं तो शायद आपको मुश्किल हो , लेकिन जो हिंदी या हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू) देवनागरी में पढ़ते हैं उन्हें ये कहानियां खूब पसंद आएँगी। कहानियां उस दौर का आइना भी है जब ये लिखी गयी थीं , इनसे आपको चालीस और उसके बाद के दशकों के बारे में जानने को भी मिलता है और उससे भी ख़ास बात है इस किताब के द्वारा आपका एक बेहतरीन लेखिका से भी परिचय होता है।
भाषा के स्तर पर भी यह संग्रह पाठक से थोड़ा धैर्य मांगता है। जिन पाठकों को उर्दू-हिंदी मिश्रित हिंदुस्तानी भाषा पढ़ने की आदत नहीं है, उन्हें शुरुआत में कुछ शब्द कठिन लग सकते हैं। लेकिन जैसे-जैसे आप कहानियों में आगे बढ़ते हैं, यही भाषा किरदारों, माहौल और समाज को और जीवंत बना देती है। मुझे लगा कि इन कहानियों को पढ़ते हुए केवल कथानक नहीं, बल्कि एक पूरा सामाजिक संसार सामने खुलता है।
मेरा निष्कर्ष
इस्मत चुगताई की कहानियाँ केवल अपने समय की सामाजिक सच्चाइयों को दर्ज नहीं करतीं, बल्कि आज के पाठक को भी असहज सवालों के सामने खड़ा करती हैं। उनकी लेखनी में बेबाकी है, संवेदना है और समाज को भीतर से देखने की गहरी समझ है। यही कारण है कि लिहाफ़ सिर्फ एक कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि स्त्री जीवन, पितृसत्ता और सामाजिक ढोंग को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण किताब बन जाती है। यह किताब उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो स्त्री जीवन, समाज, पितृसत्ता और हिंदी-उर्दू साहित्य की बेबाक परंपरा को समझना चाहते हैं।
ऐसी ही और समीक्षाओं के लिए आप मेरी हिंदी किताबों की अन्य समीक्षाएँ भी देख सकते हैं।
लेखक परिचय
इस्मत ने निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबक़े की दबी-कुचली-सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है। इस्मत चुग़ताई पर उनकी मशहूर कहानी लिहाफ़ के लिए लाहौर हाईकोर्ट में मुक़दमा चला, लेकिन ख़ारिज हो गया। उनका पहला उपन्यास जि़द्दी 1941 में प्रकाशित हुआ। मासूमा, सैदाई, जंगली कबूतर, दिल की दुनिया, अजीब आदमी और बांदी उनके अन्य उपन्यास हैं।
कई फि़ल्में लिखीं और जुनून में एक रोल भी किया। 1943 में उनकी पहली फि़ल्म छेड़-छाड़ थी। कुल 13 फि़ल्मों से वे जुड़ी रहीं। उनकी आखि़री फि़ल्म गर्म हवा (1973) को कई अवार्ड मिले। साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा उन्हें ‘इक़बाल सम्मान’, ‘मख़दूम अवार्ड’ और ‘नेहरू अवार्ड’ भी मिले। उर्दू दुनिया में ‘इस्मत आपा’ के नाम से विख्यात इस लेखिका का निधन 24 अक्टूबर, 1991 को हुआ। उनकी वसीयत के अनुसार मुम्बई के चन्दनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया।.
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About the reviewer

Manoj Payal
Manoj is an avid reader and a writer in progress, with interests spanning literature, history, politics, and the social sciences. His writing across book reviews, essays, articles, and poetry—explores ideas, society, and the human experience.He has spent over two decades working in the IT industry, a background that informs his analytical approach to reading and writing.
