Poetry books by Gulzar reading list

Poetry of Gulzar

Most of us first come to Gulzar through his songs, films, and unmistakable voice. But reading Gulzar is a different experience. His poems, nazms, and short poetic forms open up a quieter world of memory, love, loneliness, nature, books, silence, and everyday life. This post brings together some poetry books by Gulzar that I have read and enjoyed.

Page type: Personal blog / poetry reading note
Focus: Poetry books by Gulzar
Books discussed: Triveni, Pukhraj, Pandrah Paanch Pachattar, Neglected Poems, Green Poems, and Selected Poems
Best for: Readers who enjoy Hindi-Urdu poetry, Gulzar’s poems, nazms, and literary reflections
Good starting point: Triveni or Selected Poems

“सवाल ये उठा कि गुलज़ार को पढ़ें कि सुनें, देखें कि गुनगुनाएं…”

“गुलज़ार को उनकी फिल्मों में ढूंढो , तो अपनी शायरी में मिलते हैं , शायरी में तलाश करो तो अपनी कहानियों में बरामद होते हैं , कहानियों में तहक़ीक़ात करो तो उनके क़दमों के निशान उनकी स्क्रिप्टों के सफहों की तरफ मुड़ते नज़र आते हैं, और स्क्रिप्टों के सहफ़े पलटो तो पता चलता है हुज़ूर किसी लड़की के जिगर से किसी लड़के की बीड़ी जलवा रहे हैं या किसी की आँखों से पर्सनल से सवाल करवा रहे हैं। और जब लगता है कि मामला खूबसूरत लड़कियों का है इसलिए शायद गुलज़ार यहाँ देर तक रुकें, जनाब वहां से फरार होकर बच्चों की किताबों में बोस्की को गिनती सिखा रहे होते हैं।”

— Kamlesh Pandey on Gulzar

तो कुछ यूँ हैं गुलज़ार ! बहुमुखी प्रतिभा के धनी, जो उन्हें पढ़ते हैं वो जानते उनके शब्दों की जादूगरी। वैसे तो गुलज़ार किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं , और जो कमलेश जी ने परिचय दिया है  है उसके बाद अब क्या ही कहा जाये।

अगर आपका किताबों से, कविताओं से और नज़्मों से राबता है तो गुलजार की कुछ किताबें हैं जो मैंने पढ़ी हैं आपसे साझा कर रहा हूँ – उम्मीद है आपको भी पसंद आएंगी। 

त्रिवेणी

त्रिवेणी एक अलग ही विधा है लिखने की, खुद गुलज़ार के शब्दों में, “शुरू- शुरू में जब ये फॉर्म बनाई थी, तो पता नहीं था किस संगम तक पहुंचेगी – त्रिवेणी नाम इसलिए दिया था, कि पहले दो मिसरे, गंगा जमुना की तरह मिलते हैं, और एक ख्याल , एक शेर को मुकम्मल करते हैं। लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है – सरस्वती। जो गुप्त है। नज़र नहीं आती ; त्रिवेणी का काम सरस्वती दिखाना है। तीसरा मिसरा , कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है। छुपा हुआ है।” 

उदहारण के लिए :

6 books of poetry by Gulzar on bookspoetryandmore

उड़ के जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलती रही वो शाख़ फ़िज़ा में

अलविदा कहने को ? या पास बुलाने के लिए ?

सांवले साहिल पे गुलमोहर का पेड़
जैसे लैला की मांग में सिन्दूर

धर्म बदल गया बिचारी का !

 

इसमें पहले दो मिसरे अपने आप में मुक्कमल हैं ,कम्पलीट हैं। पर तीसरा मिसरा जुड़ते ही मानी बदल जाते हैं। ऐसे ही मिसरों से बनी है त्रिवेणी।

पुखराज

 गुलज़ार की नज़्मों का संग्रह है जो 1994 में प्रकाशित हुआ था। त्रिवेणी और पुखराज ये दो किताबें हैं जिनसे मैंने गुलज़ार साहब को पढ़ना शुरू किया था और उसके बाद तो उनकी कलम का  मुरीद ही बन गया। उनके इस संग्रह से एक कविता –

Booklist on bookspoetryandmore - PukhrajA collection of nazms by Gulzar

दोस्त 

बे यारो मददगार ही कटा था सारा दिन
कुछ खुद से अजनबी सा, कुछ तनहा उदास सा
साहिल पे दिन बुझा के मैं लौट आया फिर वहीँ
सुनसान सी सड़क के इस ख़ाली से माकन में

दरवाज़ा खोलते ही मेज़ पर किताब ने
हलके से फड़फड़ा के कहा —
“देर कर दी दोस्त।”

पन्द्रह पाँच पचहत्तर

गुलज़ार की कविताओं के एक और संग्रह – इसमें पन्द्रह भाग हैं और हर भाग में पाँच कवितायेँ हैं इसलिए पंद्रह पाँच पचहत्तर।

इस किताब से एक कविता – सरदार डैम

तीन पहाड़ों बीच बनी इस वादी में
बंध बनेगा !
डैम बनेगा !

सर पर लो, और चलो उठा लो, छाबा खोंचा इस गाँव का
रिश्ते-नाते , आस-पड़ोस, अब सब रेहड़ी पर रक्खो और लुढ़काओ उनको
झल्ली में डालो मिट्टी पिछली पुश्तों की, और माज़ी कंधे पे रखलो
जेब में भर लो कब्रें अपनी
रीत-रिवाज़ और कल्चर-वल्चर, गर्दन में लटका के उठो
कमर पे बांधो नंगे बच्चे…..
पीपल-तुलसी , मढ़ी-वढ़ी, दरगाहें , मीठे कुँए , चलो सब औंधे कर दो
कुछ करो अब !

तीन पहाड़ों में से रेंगता , बल खाता जो सदियों से बहता आया है
कुंडली मार कर बैठेगा अब वो दरिया इस वादी में !

Neglected Poems

किताब के नाम पर बिल्कुल न जाएं , इसमे आपको गुलजार की बेहतरीन कविताएं मिलेंगी । किसी ने गुलजार साहब से पूछा , भाई ये नम क्यूँ ? तो बोले यूं ही – इससे पहले कविताओं का एक संकलन मशहूर हो गया था – जिसका नाम था “Selected Poems”, और किताब के अनुवादक पवन के  वर्मा अपनी व्यस्तता के कारण उसके दूसरे संस्कारद का अनुवाद नहीं कर पा रहे थे और इसके चलते देरी हो रही थी । तो गुलजार साहब ने मज्जक मे कहा कि इस संस्कारद का नाम “Neglected  Poems ” रख देते हैं ।  तो कुछ यूं इस किताब का नामकरण हुआ । 

इस किताब से ये कविता जिसे पढ़कर आप भी कहेंगे कि ये Neglected  Poems तो बिल्कुल भी नहीं हैं  । 

सर्दी थी और कोहरा था

सर्दी थी और कोहरा था और सुबह की बस आधी आँख खुली थी ,
आधी नींद में थी !
शिमला से जब नीचे आते
एक पहाड़ी के कोने में
बस्ते जितनी बस्ती में इक
बटवे जितना मंदिर था
साथ लगी मस्जिद , वो भी लॉकेट जितना
नींद भरी दो बाहों जैसे मस्जिद के मीनार गले में मंदिर के ,
दो मासून खुदा सोये थे !
इक बूढ़े झरने के नीचे !!

Cover of Neglected Poems by Gulzar

शब्दों का ऐसा ताना बाना सिर्फ गुलजार ही बन सकते हैं । वो चाँद, बादल , पेशानी, रूहानी जैसे शब्दों के साथ – साथ बस्ता, बटुआ जैसे आम शब्दों को भी बड़ी खूबसूरती से अपने लेखन मे – खासकर कविताओं मे बड़ी आसानी से  पिरो देते हैं । 

Selected Poems

गुलजार की चुनिंदा कविताओं का संग्रह पवन वर्मा द्वारस अंग्रेजी मे आनुवादित । इस संग्रह से एक कविता “किताबें” जो मुझे बहुत अछि लगती है,  और कसौटी है इस बात की गुलजार क्या कमाल लिखते हैं । 

Book list on bookspoetryandmore about the poetry books of Gulzar

किताबें

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है
जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके
जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं
कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं
बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़
जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते
जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का
अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है

Green Poems

ये कविता संग्रह समर्पित है पर्यावरण ने नाम गुलजार की कलम से । 

book list on bookspoetryandmore - Green Poems a collection of poems by Gulzar

पहाड़ों से बिछड़ के लौटता हूँ तो. . . . .

पहाड़ों से बिछड़ के लौटता हूँ तो
कई दिन तक उतरता रहता हूँ उनसे,
ख़ला में लटका रहता हूँ
कहीं पांव नहीं पड़ते !
बहुत से आस्माँ बांहों में भर जाता है , वो नीचे नहीं आता
हवाएं फूल जाती हैं , पकड़ के पसलियां मेरी
कभी रातें उठा लेती हैं बग़लों से
कभी दिन तेल देते हैं हवा में
कई दिन तक मेरे पांव नहीं लगते जमीन से !!